डॉ. नीतू कुमारी नवगीत

 

गुमशुदा इंसान की ख़ामोशी को अल्फ़ाज़ का जामा पहनाकर उन्हें मजबूती प्रदान करने के लिए समीर परिमल अपने कलम का इस्तेमाल हथियार की तरह करते हैं। उनकी ग़ज़लों में बेबाक़ी है, साफ़गोई है, उम्मीद है और उन सब से भी बढ़कर जमाने के बदलते अंदाज़ के साथ ग़ज़ल की रूह को ज़िंदा रखते हुए निराले अंदाज़ में अपनी बात कहने की अदा है। सुभांजलि प्रकाशन से प्रकाशित उनकी ग़ज़लों का ताज़ा संग्रह दिल्ली चीख़ती हैगजल संसार में हवा के ताज़े झोंके के समान है । डॉ. क़ासिम ख़ुरशीद कहते हैं- समीर परिमल ने बहुत रवादारी, दयानतदारी और पूरी रचनात्मकता के साथ  ग़ज़ल की आबरू को बरकरार रखते हुए पूरी शिद्दत के साथ अपनी पहचान दर्ज कराई है ।

वस्तुतः दिल्ली चीखती हैसमीर परिमल का दूसरा ग़ज़ल संग्रह है । 2014 में चंद क़तरे का प्रकाशन हुआ था जो एक ही परिवार के तीन सदस्यों का समवेत गजल संग्रह था जिसमें डॉ नीलम श्रीवास्तव और अस्तित्व अंकुर के साथ-साथ समीर परिमल की 21 गज़लों का प्रकाशन हुआ था। लेकिन दिल्ली चीख़ती हैसमीर परिमल का एकल संग्रह के रूप में प्रथम प्रयास है । जाहिर है समीर परिमल को अभी बहुत कुछ कहना है। अपने प्रथम दो संग्रहों में जिस प्रकार की शायरी उन्होंने पेश की है, वह उन्हें एक बड़ा क़लमकार बनाता है।

दिल्ली चीख़ती हैग़ज़ल संग्रह तीन भागों- बेचैनियां‘, ‘मंजिले- दीवानगीऔर दिल्ली चीख़ती हैमें विभक्त है। साथ ही इसमें कुछ मुक्तक भी शामिल किए गए हैं। हालात पर पैनी नजर रखते हुए वह घटनाओं की तह में जाकर बड़ी बेबाक़ी से ग़लत को ग़लत और सही को सही कहते हुए अपनी बात रखते हैं और जो ग़लत है, उस पर तंज कसते हुए कहते हैं-

दर-ओ-दीवार से आंसू टपकते हैं लहू बनकर

इसी कमरे में अरमानों का एक बिस्तर रहा होगा।

तेरी बुनियाद में शामिल कई मासूम चीख़ें हैं

इमारत बन रही होगी तो क्या मंज़र रहा होगा।।

भारत के सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक और सांस्कृतिक परिवेश पर भी समीर परिमल तीखी टिप्पणी करते हैं-

ग़रीबी आज भी भूखी ही सोई

मेरी थाली में रोटी चीख़ती है ।

हक़ीक़त से तो मैं नज़रें चुरा लूं मगर ख़्वाबों में दिल्ली चीख़ती है ।।

 देश दुनिया में घट रही असहज घटनाओं से उद्वेलित होकर समीर परिमल विचलित होते हैं और समाज का यथार्थ चित्रण करते हुए जीवन मूल्यों के प्रति सजगता भी दिखाते हैं-

लड़ने से बाज़ आ तू लड़ाने से बाज़ आ

नफ़रत की आग दिल में लगाने से बाज़ आ ।

कब तक पलेंगी ख़ौफ़ के साए में उल्फ़तें

इंसानियत का ख़ून बहाने से बाज़ आ ।।

जीवन मूल्यों के प्रति समीर की सजगता इन पंक्तियों में दिखती है-

दूसरों के काम आओ, ज़िंदगी है और क्या

रंजो ग़म में मुस्कुराओ, रोशनी है और क्या

क्या परस्तिश, क्या इबादत, जानता परिमलनहीं

मां के आगे सिर झुका है, बंदगी है और क्या ।

समीर परिमल की कुछ ग़ज़लों में प्रेमानुभूति का स्वर भी काफी गहरा है-

खयालों में आने का वादा करो तो

जमाने से रिश्ता-ए-ग़म तोड़ दें हम।

लबों पर तुम्हारे तबस्सुम सजाकर

मोहब्बत के साए में दम तोड़ दें हम।।

कुल मिलाकर कहें तो समीर परिमल ग़ज़ल के हर फ़न से वाकिफ़ ग़ज़लकारों में अपना महत्वपूर्ण स्थान बनाने की दिशा में अग्रसर हो चले हैं। उनका यह संग्रह मानवीय मूल्यों तथा समसामयिक परिवेश को बेहतर बनाने के लिए प्रयत्नशील दिखता है। ग़ज़ल विधा को पसंद करने वाले पाठकों के लिए यह पुस्तक संग्रहणीय है । आने वाले समय में फ़नकार से इसी तरह के और संग्रहों की उम्मीद की जानी चाहिए।

 गजल संग्रह : दिल्ली चीखती है

गजलकार : समीर परिमल

पेज :120 (सजिल्द संस्करण) मूल्य : 300

प्रकाशक : सुभांजलि प्रकाशन, कानपुर, उत्तर प्रदेश