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समीर परिमल की चार ग़ज़लें

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साज़िशों की भीड़ थी, चेहरा छुपाकर चल दिए

नफ़रतों की आग से दामन बचाकर चल दिए

नामुकम्मल दास्तां दिल में सिमटकर रह गई

वो ज़माने की कई बातें सुनाकर चल दिए

ज़िक्र मेरा गुफ़्तगू में जब कभी भी आ गया

मुस्कुराए और फिर नज़रें झुकाकर चल दिए

मंज़िले-दीवानगी हासिल हुई यूँ ही नहीं

क्या बताएं प्यार में क्या-क्या गंवाकर चल दिए

वक़्त से पहले बड़ा होने का ये हासिल हुआ

तिश्नगी में हम समन्दर को उठाकर चल दिए

रंग काला पड़ गया है मरमरी तक़दीर का

मुफ़लिसी की धूप में अरमां जलाकर चल दिए

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ताक़ पर रक्खी मिली मुझको किताबे-ज़िन्दगी

कुछ फटे पन्ने मिले और कुछ सिसकती शायरी

चंद ज़ख्मों की विरासत, चंद अपनों के फ़रेब

उसपे दुनिया की रवायत और मेरी आवारगी

मुद्दतें गुज़रीं, कोई पढ़ने को राज़ी भी नहीं

छुप नहीं पाती है लफ़्ज़ों के दिलों की बेकली

हाय वो मासूम आँखें और उन आँखों के ख़्वाब

इक पशेमाँ आदमी, आंसू बहाती बेबसी

साज़िशों में क़ैद है तू, ख़ुद में सिमटा मैं भी हूँ

इक तरफ है बेरुखी और इक तरफ दीवानगी

इस समंदर का किनारा अब नज़र आता नहीं

साथ मेरे जाएगी मेरी ये शौके-तिश्नगी

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हवाएँ रूठ जाती हैं, फ़िज़ाएँ रूठ जाती हैं

सियासत बोलती है जब, वफ़ाएँ रूठ जाती हैं

समझती हैं घटाएँ इस ज़मीं की प्यास को लेकिन

गुरूर आये ज़मीं को तो घटाएँ रूठ जाती हैं

कभी जब भूख से बच्चा कोई रोता दिखाई दे

मेरे महबूब से सारी अदाएँ रूठ जाती हैं

बना तो ली बहुत ऊँची इमारत, याद रखना पर

बुलंदी देख कर दिल की सदाएँ रूठ जाती हैं

मेरी धड़कन, मेरी साँसें उतारू हैं बग़ावत पर

मसीहा गर खफ़ा हो तो दवाएँ रूठ जाती है

इबादत लाख मैं कर लूँ, मगर सच है यही परिमल

नहीं लूँ नाम माँ का तो दुआएँ रूठ जाती हैं

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बड़ा जबसे घराना हो गया है

खफ़ा सारा ज़माना हो गया है

हुई मुद्दत, किये हैं ज़ब्त मोती

निगाहों में खज़ाना हो गया है

जडें खोदा किये ताउम्र जिसकी

शजर वो शामियाना हो गया है

करेंगे खर्च अब जी भर के यारों

बहुत नेकी कमाना हो गया है

मुहब्बत की नज़र मुझपे पड़ी थी

वो ख़ंजर क़ातिलाना हो गया है

हमें फुर्सत कहाँ अब शायरी से

बड़ा अच्छा बहाना हो गया है

दिवाली-ईद पर भाई से मिलना

सियासत का निशाना हो गया है

चलो परिमल की ग़ज़लें गुनगुनायें

कि मौसम आशिक़ाना हो गया है