नीतू कुमारी नवगीत

प्रकृति की गोद में ही संस्कृति पलती है। आदिकाल से भारत की प्रकृति अद्वितीय रही है। इसे अनुपम प्राकृतिक संपदा के बीच भारतीय संस्कृति पुष्पित-पल्लवित हुई है। ऐसे में यदि लोक संस्कृति में प्रकृति को विशेष महत्व दिया गया है तो कदाचित वह आश्चर्यजनक नहीं है। विश्व पर्यावरण दिवस तो वर्ष में एक बार मनाया जाता है लेकिन हिंदू व्रत त्योहारों के दौरान प्रकृति की पूजा बार-बार की जाती है। गंगा नदी नहीं तो देश की किसी भी नदी में स्नान प्रायः हर पर्व-त्योहार के दौरान जरूरी ही माना जाता है। स्नान के बाद नदी की पूजा अनिवार्य रूप से की जाती है।

व्रत त्यौहार के दिन पेड़-पौधों की पूजा भी की जाती है। किसी भी प्रकार की पूजा में अनिवार्य रूप से आम के पत्ते, केले के पत्ते, तुलसी के पत्ते, बांस की कन्नी आदि की आवश्यकता होती है। चंदन की लकड़ी को घिसकर उसके लिए लेप का टीका ना सिर्फ भगवान को लगाते हैं बल्कि भक्तगण भी उसी का टीका लगाते हैं। वट सावित्री पूजा के दिन महिलाएं बरगद के पेड़ को रक्षा सूत्र बांधती हैं और प्रार्थना करती हैं कि जिस तरह बरगद के पेड़ की उम्र लंबी होती है उसी तरह उनके पति की उम्र भी लंबी हो। आंवला के वृक्ष के नीचे भी एकादशी व्रत कथा होती है। भगवान बुद्ध के जीवन में तरह-तरह के वृक्षों का अलग-अलग महत्व रहा है। उनका जन्म लुंबिनी वन में अशोक वृक्ष के नीचे हुआ था तो उन्हें ज्ञान की प्राप्ति बोधगया में पीपल के पेड़ के नीचे हुई थी। वर्षा ऋतु में पर्यावरण और पेड़ पौधों की रक्षा के लिए वे भ्रमण का कार्यक्रम स्थगित रखते थे। उन्होंने श्रावस्ती सहित अनेक स्थानों पर आम्र  के पेड़ भी लगाए।

मां दुर्गा नीम के पेड़ की छांव में रहना पसंद करती हैं तो  हम सबके प्यारे भोलेनाथ बेल के वृक्ष को पसंद करते हैं। भांग और धतूरे जैसे फल भी उन्हें प्रिय हैं। भारतीय ग्रंथों में एक पेड़ लगाने को सौ पुत्रों के समान बताया गया है। पारंपरिक लोकगीतों में भी निमिया के डार, केलवा के पात, बरगद की छांव, अमावा-महुआ इटली आदि की चर्चा बार-बार की गई है जो इस बात को इंगित करता है कि हमारी लोक संस्कृति में प्रकृति और पर्यावरण को सदा ही विशेष महत्व दिया गया है।

लेखिका लोकप्रिय लोक गायिका हैं