नोएडा। हमारे देश में नारी शक्ति की पूजा ‘मां भगवती’ और ‘शक्ति’ के रूप में की जाती है और इसकी ठोस वजह है। इस नवरात्रि में जेपी हॉस्पिटल में किडनी ट्रांसप्लांट के दो बड़े गंभीर मामले नारी शक्ति के प्रति हमारी आस्था बढ़ा देंगे। दरअसल, दो मामले सिर्फ महिलाओं द्वारा किडनी दान का नहीं है, बल्कि साबित करते हैं कि आज भी हमारे देश की महिलाएं कैसे अपने परिवार की नींव को बचाने के लिए अपना सर्वस्व त्यागने को तैयार रहती हैं। डॉ. अमित के. देवडा की निगरानी में ये दोनों ट्रांसप्लांट सफल रहे। ट्रांसप्लांट सर्जिकल टीम में डॉ. देवडा के अलावा डॉ. मनोज अग्रवाल और डॉ. लोक प्रकाश चौधरी भी शामिल थे।

43 वर्षीय सुरेश कुमार डायबिटीज के मरीज हैं। कुछ समय पहले उन्हें गंभीर हालत में जेपी हॉस्पिटल लाया गया था। उनकी जांच नेफ्रोलॉजिस्ट डॉ. विजय सिन्हा ने की। सुरेश की किडनियां लगभग पूरी तरह से काम करना बंद कर चुकी थीं। अब इस कहानी का दूसरा पहलू यह है कि जेपी हॉस्पिटल आने से पहले भी उनका किडनी ट्रांसप्लांट हो चुका था। उस समय उनकी मां ने अपनी किडनी उन्हें दान की थी लेकिन दुर्भाग्य से कुछ समय बाद ट्रांसप्लांट प्रक्रिया विफल हो गई। इसके बाद ही वह बार—बार बीमार पड़ने लगे और उस वक्त उनकी पत्नी किडनी दान करने के लिए आगे आईं। यहां भी किस्मत ने उनका साथ नहीं दिया। दुख की बात है कि कुछ चिकित्सा कारणों से दूसरे प्रत्यारोपण में भी सफलता नहीं मिली।

सुरेश का जेपी हॉस्पिटल आना उसके और उसके परिवार के लिए वरदान साबित हुआ। सुरेश की स्थिति का जायजा लेने के बाद जेपी हॉस्पिटल के डॉक्टरों की टीम ने फिर किडनी ट्रांसप्लांट का सुझाव दिया। इस बार परिवार से एक और महिला सदस्य किडनी दान के लिए आगे आईं और यह थी उनकी 21 साल की बेटी काजल।

समस्त प्रक्रिया के बारे में काजल बताती हैं, ‘मैंने बिना कुछ भी विचार किए यह कदम उठाने का फैसला किया। इस दुनिया में मां—बाप किसी भी चीज से ज्यादा मूल्यवान होते हैं।’

दूसरा मामला श्रीमती शकुंतला यादव का है जिन्होंने मिसाल पेश करते हुए मां होने के नाते अपने बच्चों में अच्छे संस्कार भरे। वह अपनी बेटी मीनू को बहुत ही गंभीर स्थिति में जेपी हॉस्पिटल लेकर आई। शुरुआत में मीनू का इलाज नेफ्रोलॉजिस्ट डॉ. अनिल भट्ट ने किया और एक समय ऐसा भी आया कि मरीज के लिए किडनी ट्रांसप्लांट ही एकमात्र विकल्प बच गया। मां शकुंतला देवी बिना कोई देर किए बेटी को अपनी किडनी देने के लिए तैयार हो गई। यहां गौर करने वाली एक और बात है कि वर्ष 2014 में इसी महिला ने अपने दामाद को अपना लीवर दान किया था। सही मायने में शकुंतला देवी ‘मां भगवती’ का अवतार हैं।

जेपी हॉस्पिटल, नोएडा में यूरोलॉजी एवं किडनी ट्रांसप्लांट के निदेशक और किडनी ट्रांसप्लांट प्रोग्राम के संयोजक डॉ. अमित के. देवडा बताते हैं, ‘जैसे ही किडनी फेल हो जाती है, मरीज को अपने सामान्य जीवन में लौटने के लिए डायलिसिस के बजाय ट्रांसप्लांट कराना ही बेहतर विकल्प माना जाता है। हालांकि ट्रांसप्लांट प्रक्रिया में कई सारी चुनौतियां हैं। ट्रांसप्लांट के बाद भी मरीज को नियमित जांच और अन्य चेकअप के लिए डॉक्टर के पास आते रहना चाहिए। जेपी अस्पताल में हमारी टीम को अपार खुशी है कि हमने सफलतापूर्वक 500 किडनी ट्रांसप्लांट को अंजाम दिया और इनमें से 99 फीसदी मामलों में ट्रांसप्लांट किडनी के सही काम करते हुए मरीजों को अस्पताल से छुट्टी दी गई।’

जेपी हॉस्पिटल का प्रयास रहता है कि यह अपने मरीजों को बेहतरीन स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया कराए। किडनी ट्रांसप्लांट के इन 500 मामलों से इसने कई सारे मरीजों को नई जिंदगी दी है।